देहरादून की साझी विरासत पर शहर क़ाज़ी का पैग़ाम: इंसाफ़, अमन और आईनी (संवैधानिक) अक़दार का बयान

देहरादून की इस तारीखी जामा मस्जिद में आप सभी का ख़ैर-मक़दम है। आज हम यहाँ किसी शिकायत या टकराव के लिए नहीं, बल्कि एक मुक़द्दस उसूल और एक मक़सद के साथ जमा हुए हैं—और वह उसूल है ‘इंसाफ़’। इस्लाम का बुनियादी पैग़ाम ही यही है कि मुआशरे (समाज) की बुनियाद ‘अदल’ (न्याय) पर कायम हो। याद रखिए, इंसाफ़ महज़ एक क़ानूनी लफ़्ज़ नहीं, बल्कि किसी भी सभ्य समाज की ‘अख़लाक़ी रीढ़’ (नैतिक रीढ़) है।

शहर क़ाज़ी की सरपरस्ती में ‘शूरा कमेटी’ की ज़िम्मेदारी मुफ़्ती सलीम अहमद क़ासमी साहब को सौंपी गई है। यह ज़िम्मेदारी किसी ओहदे या सियासत की नहीं, बल्कि अमन और आईन-ए-हिंद (संविधान) के दायरे में रहकर समाज की बेहतरी और ‘ख़िदमत-ए-ख़ल्क़’ करने की है। ‘शूरा’ की रूह ही आपसी मश्विरा और मुंसिफ़ाना (न्यायपूर्ण) फ़ैसला है।

पैग़म्बर-ए-इस्लाम ﷺ ने यह साफ़ पैग़ाम दिया है कि समाज की हक़ीक़ी मज़बूती इंसाफ़ पर टिकी है। सामाजिक न्याय की बुनियाद समानता, निष्पक्षता और क़ानून की हुक्मरानी (Rule of Law) पर होती है। इंसाफ़ के लिए यह लाज़मी है कि क़ानून किसी भी सूरत में किसी फ़र्द (व्यक्ति) या गिरोह के हाथों का खिलौना न बन जाए। अगर मुआशरे में लोग खुद ही क़ानून को नाफ़िज़ (लागू) करने का इख़्तियार अपने हाथों में लेने लगें, तो इससे न सिर्फ़ निज़ाम कमज़ोर होता है, बल्कि सामाजिक अमन को भी शदीद ख़तरा लाहक़ हो जाता है। विवादों और आरोपों का निपटारा केवल और केवल विधिसम्मत और संस्थागत प्रक्रियाओं के ज़रिए ही होना चाहिए।

इंसानियत हमें सिखाती है कि समाज की मज़बूती का अंदाज़ा इस बात से लगाया जाता है कि वहाँ कमज़ोर, ग़रीब और बेगुनाह कितना महफ़ूज़ है। अगर किसी भी शहरी के साथ नाइंसाफ़ी होती है—चाहे उसका ताल्लुक किसी भी मज़हब, ज़ात या तबक़े से हो—तो हमारी अख़लाक़ी ज़िम्मेदारी है कि हम पुर-अमन और संवैधानिक तरीक़े से उसकी आवाज़ हुकूमत और प्रशासन तक पहुँचाएँ। ‘खुद-साख़्ता इंसाफ़’ (Self-justice या स्व-निर्णीत कार्रवाई) न सिर्फ़ व्यक्तिगत सुरक्षा को ख़तरे में डालता है, बल्कि पूरे समाज के तवाज़ुन (संतुलन) को बिगाड़ देता है।

देहरादून और उत्तराखंड की यह सर-ज़मीन हमेशा से अमन-ओ-अमान की मिसाल रही है। अगर कहीं कोई ग़लतफ़हमी या कड़वाहट पैदा होती है, तो इस्लाम हमें ‘तशद्दुद’ (हिंसा) का नहीं, बल्कि ‘संवाद’ और ‘अदल’ का रास्ता दिखाता है। विचारों की आज़ादी हमारे समाज का एक अहम सुतून (स्तंभ) है, जहाँ लोग बिना किसी ख़ौफ़ के अपनी बात रख सकें, सवाल कर सकें। लेकिन यह आज़ादी ज़िम्मेदारी, तथ्यपरकता और क़ानून के एहतराम के साथ जुड़ी होनी चाहिए।

हम सरकार से गुज़ारिश करते हैं कि वह क़ानून के शासन को मज़बूत करे और इंसाफ़ को इतना सहल (सुलभ) बनाए कि हर नागरिक को निष्पक्ष समाधान मिल सके। साथ ही, अदलिया (न्यायपालिका) से हमारी यह उम्मीद समाज के इस्तेहकाम (स्थिरता) से जुड़ी है कि वह पारदर्शिता को यक़ीनी बनाए, ताकि आम आदमी का एतमाद (विश्वास) इस निज़ाम पर बरक़रार रहे।

आख़िर में, मैं यह साफ़ कर देना चाहता हूँ कि शूरा कमेटी का क़ियाम (गठन) किसी के विरोध में नहीं, बल्कि समाज की फ़लाह (भलाई) और इंसाफ़ की बहाली के लिए हुआ है। हमारा हाथ अमन का है, हमारी आवाज़ इंसाफ़ की है। हमें उम्मीद है कि आप मीडिया के साथी इस पैग़ाम को उसकी सही रूह के साथ आवाम तक पहुँचाएँगे—ताकि हर नागरिक खुद को सुरक्षित, पुर-वक़ार (सम्मानित) और न्याय के साथ जुड़ा हुआ महसूस करे।

बहुत-बहुत शुक्रिया।

शहर काज़ी देहरादून हज़रत मुफ्ती हशीम अहमद क़ासमी, शूरा कमेटी के सदर हज़रत मुफ्ती सलीम अहमद क़ासमी, दिलशाद अहमद कुरैशी ने संयुक्त रूप से प्रेस को संबोधित किया।

इस मौके पर पार्षद मुकीम अहमद, मुफ्ती ताहिर कासमी, आतिफ शेख़, नसीम अहमद, अब्दुल रहमान (शब्लू), सय्यद मौ० अरशी, हाकिम खान, आसिफ कुरैशी, हाजी शमशाद, मौ आरिफ, असगर खान, सलीम अहमद, सुलेमान अंसारी, फहीम अहमद आदि मौजूद रहे।

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